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Thursday, December 8, 2011

नैनीताल में देखिएगा, कैसे तन गयीं टेथिस सागर की गहराइयों में हिमालय की ऊंचाइयां


अतीत की निशानियों पर टेथिस की कहानी
एक करोड़ 20  लाख वर्ष पूर्व हिमालय की जगह था टेथिस सागर 
जीवाश्मों से मिलेगी टेथिस सागर से हिमालय की उत्पत्ति की जानकारी 
हिमालय बॉटनिक गार्डन में बनेगा समुद्री जीवाश्मों का पार्क 
नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया शांत समझी जाने वाली प्रकृति कितनी सामथ्र्यवान है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसा ही कुछ 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व टेथिस नाम के सागर में घटा। यहां भारतीय प्लेट (महाद्वीप) टेथिस सागर में तैरता हुआ आया और आज के उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्र में तिब्बती प्लेट से बहुत वेग से टकराया। इस टकराव से हजारों मीटर गहरे समुद्र में आठ किमी तक ऊंचे हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ। यही कारण है कि हिमालयी क्षेत्रों में समुद्री जीवों के जीवाश्म मिलते रहे हैं। इन जीवाश्मों का नारायणनगर में स्थित हिमालयन बाटनिक गार्डन में रखा जाएगा। इससे शोध विद्यार्थी टेथिस सागर पर हिमालय जैसे पर्वत के उत्पन्न तथा विकसित होने की विकास यात्रा का अध्ययन कर सकेंगे। इस टकराव में भारतीय प्लेट तिब्बती प्लेट में धंस गई। यही इस क्षेत्र में भूकंपीय संवेदनशीलता का मुख्य कारण है। हिमालय और खासकर उत्तराखंड में टेथिस सागर के जलीय जंतुओं के जीवाश्म मिलते हैं। प्रदेश का वन महकमा पहाड़ पर मिलने वाले समुद्री जीवाश्मों को नैनीताल में संरक्षित करने की योजना बना रहा है। कुमाऊं विवि के भू-विज्ञान विभाग के प्रो. चारु चंद्र पंत के अनुसार लगभग छह से दो करोड़ वर्ष पूर्व धरती केवल उत्तरी एवं दक्षिणी दो गोलार्ध के दो भागों में बंटी थी। टेथिस दुनिया का मुख्य समुद्र था। भू वैज्ञानिक विजय कुमार जोशी के अनुसार करीब 1.2 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय व एशियाई प्लेटें आपस में टकराई। इससे कश्मीर के जास्कर- अनंतनाग से हिमाचल, उत्तराखंड, नेपाल एवं अरुणाचल प्रदेश तक कई स्थानों पर 4,500 मीटर की ऊंचाई तक टेथियस पर्वत श्रृंखला खड़ी हो गई। यह बाद में हिमालय कहलाया। हिमालय का उठना अब भी जारी है। इसलिए इसे युवा पहाड़ कहा जाता है। इस पर्वत श्रृंखला में पिथौरागढ़ जिले में स्थित नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व क्षेत्र के लेप्थल स्थित लिलंग व गब्र्याग के गांवों में 10 हजार हेक्टेयर क्षेत्र, नैनीताल जनपद में आल सेंट कालेज, भवाली व दोगांव के जंगल सहित कई स्थानों पर समुद्री सीपों-घोंघों मुख्यत: नौटिलस, अम्मोनाइट्स व बैलनाइट्स प्रजातियों के जीवाश्म (जो कि समुद्री क्षेत्रों में भी लुप्त हो चुके हैं) तथा चूनाश्म व मृदाश्म मिलते हैं। यह छह करोड़ वर्ष पूर्व तक के बताये जाते हैं। ये दुनिया में सबसे पुराने जीवाश्म हैं। इधर, नैनीताल के डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते के अनुसार उनकी योजना नगर के पास नारायणनगर में स्थित हिमालयन बाटनिक गार्डन में इन जीवाश्मों का पार्क बनाने की है। जीवाश्मों की उम्र की लखनऊ के बीरबल साहनी पुरा वनस्पति विज्ञान संस्थान से उम्र व प्रजातियों का परीक्षण कराया जाएगा। इसके बाद उनको यहां रखा जाएगा। भू वैज्ञानियों को उम्मीद है कि ऐसा होने से नगर में ईको व जियो टूरिज्म का नया आयाम खुल जाएगा। शोध विद्यार्थी टेथिस सागर पर हिमालय जैसे वि के सबसे ऊंचे पर्वत के उत्पन्न तथा विकसित होने की विकास यात्रा का भी अध्ययन कर सकेंगे। 
लुट रहा है जीवाश्मों का खजाना 
पिथौरागढ़ के लेप्थल क्षेत्र में मौजूद समुद्री जीवाश्म बेशकीमती हैं। स्थानीय भाषा में इनको शालीग्राम कहा जाता हैं। इन्हें घर में रखने से समृद्धि आने की मान्यता है। कहा जाता है कि आरंभ में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवान शौकिया ही इन्हें घरों को ले जाते थे। हाल के वर्षो में इनकी तस्करी होने लगी है। इसलिए इनको संरक्षित करने की मांग की जा रही है।

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