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Thursday, August 5, 2010

लाखों देकर भी सुरक्षित नहीं आपकी `जान´

नवीन जोशी, नैनीताल। शीर्षक पढ़कर आप शायद चौकें, परन्तु सच यही है। देश में महंगे से महंगे चिकित्सालयों में लाखों रुपऐ देकर भी किसी की जान सुरक्षित नहीं है। देश में निजी नर्सिंग होम, पाली क्लीनिक, चिकित्सालयों आदि में वास्तव में कायदे कानूनों के पालन करने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि अविश्वसनीय किन्तु सच्चाई यह है कि देश में निजी चिकित्सालयों के लिए कोई नियम, कायदे-कानून बने ही नहीं हैं। देश में किसी चिकित्सक के लिए अपना किसी भी प्रकार के निजी चिकित्सालय खोलने के लिए न किसी प्रकार के लाइसेंस लेने का प्राविधान है, न कहीं पंजीकरण करने की पाबन्दी है और न ही ऐसे संस्थानों में जरूरी सुविधाऐं उपलब्ध कराने के लिए कोई दिशा निर्देश। ऐसे में निजी चिकित्सा संस्थानों में स्वास्थ्य सुविधाऐं एवं मरीजों की जान भगवान भरोसे नहीं तो और क्या है ?
  • निजी नर्सिंग होम, पाली क्लीनिकों के लिए नियम कानून ही नहीं 
  • इनके कोई लाइसेंस पंजीकरण ही नहीं होते, इसलिए किसी को कार्रवाई का अधिकार भी नहीं 
यहां नैनीताल में बीती 13 जुलाई को एक नर्सिंग होम में स्वस्थ बालक को जन्म देने के बाद एक पीसीएस चयनित महिला की मृत्यु हो गई थी। इस मामले में कुछ संगठन आन्दोलनरत हैं। इस मामले में डीएम नैनीताल द्वारा सीएमओ से जांच कराई गई, जिसकी रिपोर्ट तो सार्वजनिक नहीं की गई है, परन्तु चिकित्सा विभाग के ही एक उच्चाधिकारी अनौपचारिक तौर पर बता चुके हैं कि मां की मौत नर्सिंग होम की लापरवाही के कारण हुई। नर्सिंग होम में वास्तव में डिलीवरी कराने योग्य उपकरण ही नहीं थे। लापरवाही इतनी थी कि गर्म पानी की बोतल से नवजात बच्चे का पांव जला दिया गया। मृत्यु शैय्या पर पड़ी मां के लिए रक्त बाहर से मंगाया गया, और सरकारी रक्तकोश से रक्त लाने के लिए परिजनों का सहयोग नहीं किया गया कि गलती उजागर न हो जाऐ। सम्भवतया इसी कारण महिला को अन्तिम क्षणों में सरकारी 108 एंबुलेंस सेवा से अन्यत्र ले जाने की इजाजत भी नहीं दी गई, और प्राइवेट एंबुलेंस लेने का दबाव बनाया गया। खैर....यह तो एक मामला है। देश में ऐसे ही न जाने कितने मामलों में सरकार के मातृ-शिशु मृत्यु दर घटाने के अरबों रुपऐ के अभियानों के बावजूद जच्चा-बच्चा की मौत हो जाती है। साथ ही अन्य मामलों में गैर गम्भीर रोगी भी निजी चिकित्सालयों की लापरवाही की वजह से कमोबेश रोज ही अकाल मृत्यु का शिकार होते हैं। साफ कर दूं कि मैं निजी चिकित्सालयों की बात इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि सरकारी चिकित्सालयों में तो संसाधनों, चिकित्सकों व स्टाफ की कमी के कारण रोगियों की मौत आम बात है, और निजी चिकित्सालयों में लोग घर-जमीन-जेवहरात बेचकर भी अपनों को बचाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। 
बात वापस नैनीताल में महिला की मौत की ओर मोड़ते हैं। इस मामले में महिला की मौत में स्पष्ट तौर पर नर्सिंग होम की लापरवाही के बावजूद जिला प्रशासन कोई कार्रवाई सम्भवतया चाहकर भी नहीं कर पा रहा। क्योंकि देश में निजी चिकित्सालयों के लिए कोई कायदे-कानून ही नहीं हैं। कोई भी चिकित्सक देश के किसी भी राज्य की मेडिकल फैकल्टी में अपना पंजीकरण कराकर वहां सरकारी नौकरी करने अथवा अपनी डिग्री के अनुरूप निजी चिकित्सालय, नर्सिंग होम अथवा पाली क्लीनिक खोलने को पात्र हो जाता है। लेकिन वह अपने संस्थान में क्या संसाधन जुटाऐगा, कितने सहकर्मी रखेगा। रोगियों को किसी उपचार सुविधा देने का दावा करने के लिए उसके पास क्या सहूलियतें होनी चाहिऐ, यह तय करने के लिए देश में आजादी के छह दशकों बाद भी कोई नियामक संस्था ही नहीं है। ऐसे में उसके यहां कितनी बड़ी से बड़ी दुर्घटना हो जाऐ, अधिक से अधिक उसका उस राज्य में पंजीकरण निरस्त हो सकता है, उसके निजी संस्थान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है। इस बाबत जब उत्तराखण्ड के स्वास्थ्य महानिदेशक डा. एचसी भट्ट से बात की गई तो उन्होंने साफ कहा कि उनके विभाग का निजी चिकित्सालयों, नर्सिंग होमों पर कोई नियन्त्रण नहीं है। हालांकि यह संयोग ही है कि इधर संसद में इस तरह का बिल आने की चर्चा है, जिसके तहत योग बाबा रामदेव सहित अन्य बाबाओं के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने एवं निजी चिकित्सालयों के नियामक बनाने की बात कही जा रही है। यह बिल कब, किस रूप में तथा कब तक आता है, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है।  
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