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Saturday, February 27, 2010

स्वर्गवासी नैनीताल को बनायेंगे स्वर्ग !!

करोड़ों की नैनीताल स्वर्ग बनाओ परियोजना मंजूर !!

बिना अतिरिक्त बजट के सबके सहयोग से होगी पूरी

यूं कश्मीर के साथ नैनीताल को हमेशा से ही स्वर्ग कहा जाता है, और यहां के लोगों को जीते जी स्वर्गवासी, लेकिन वास्तव में अब जाकर यहां के लिए हजारों करोड़ रुपऐ की `नैनीताल स्वर्ग बनाओ परियोजना´ मंजूर कर ली गई है। होली के मौके पर नगर के जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों व समस्त नागरिकों की उपस्थिति में इसे मंजूरी दी गई। खास बात यह है कि परियोजना बिना एक भी रुपया अतिरिक्त खर्च किऐ जनसहयोग से पूरी होगी। सभी ने अपने आचरण व कार्यों से परियोजना को शीघ्र पूरा करने का भरोसा दिलाया।
होली के मौके पर परियोजना के बाबत नगर में आयोजित आम सभा में प्रशासनिक अधिकारियों ने माना कि राजनीतिज्ञों के बीच अधिक व जनता के बीच कम रहने से उन पर भी राजनीतिक रंग चढ़ गया है। परिणामस्वरूप वह भी जनता की स्वप्न सदृश कभी पूरी न होने वाली योजनाओं की घोशणा कर भूल जाते हैं। आयुक्त एस राजू ने कहा कि नगर को साफ करने के लिए बातों में कई बार चला चुके डण्डे को वह अब चलाकर दिखाऐंगे। अतिक्रमणकारियों और अवैध निर्माणों पर उनकी अध्यक्षता वाला झील विकास प्राधिकरण केवल `खुन्दक´ की कार्रवाइयां करने से बाज आऐगा। डीएम शैलेश बगौली ने माना कि नगर में तीसरे कार्यकाल के बावजूद उन्हें लोग पहचान नहीं पाते हैं, इसलिऐ वह थोड़ा कड़क होकर कार्रवाई करेंगे, और अपने कार्यालय को जरूर कुछ समय देंगे। नगर के प्रथम एकल पुरुश पालिकाध्यक्ष मुकेश जोशी ने अपने कार्यालय को चमकाने के बाद नगर को चमकाने का अपना पुराना भूल चुका वादा दोहराया। माना कि जहां से वह शुरू हुऐ थे वहीं खड़े हैं, स्ट्रीट लाइटें बुझ चुकी हैं, गन्दगी माल रोड तक में फैल गई है। झील का बुरा हाल है। क्षेत्रीय सांसद राजा केसी सिंह `बाबा´ ने कहा कि उन्हें याद है कि नैनीताल नगर एवं जिला उनके ही लोकसभा क्षेत्रा में आता है, और वह चुनावों से पूर्व एक दो बार जरूर यहां आऐंगे। कम से कम एक दो शिलान्यास लोकार्पण पटों पर उनका नाम जरूर होना चाहिऐ। विधायक खड़क सिंह बोहरा ने नगर वासियों को दर्शन  देते रहने का वादा किया, और इस बात से इंकार किया कि वह अभी से नऐ विधानसभा सीट की खोज में जुट गऐ हैं। सभा में राजकीय कर्मचारियों ने एक स्वर में कहा कि वह बेरोजगारों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुऐ अपनी अगली सात की बजाय दो पीढ़ियों के भविष्य के प्रति ही सचेत रहेंगे। आईजी जीवन चन्द्र पाण्डे एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एमएस बनंग्याल ने कहा कि पुलिस के लिए कहानियां बनाना मजबूरी है। आगे कोशिश होगी कि पुलिस केवल फूल थमाने भर को नहीं वरन वास्तव में अपराधियों की बजाय जनता की मित्र होगी और समाज को भयमुक्त करेगी। इस मौके पर नगर के बुद्धिजीवियों व पर्यावरणविदों ने कहा कि आगे से वह किसी योजना का विरोध करने से पहले यह सुनिश्चित करेंगे कि जैसी पक्की सड़कों का वह विरोध करेंगे वैसी पक्की सड़क अपने घर तक के लिए हरगिज नहीं बनाऐंगे। युवाओं व छात्रों ने वादा किया कि आगे से अखबार में अपनी फोटो पुतले फूंककर नहीं वरन कक्षा, विवि में प्रथम आने पर ही छपवाऐंगे। व्यवसायियों ने कहा कि फड़ों को हटाने से पूर्व स्वयं के नालियों, सड़कों पर किऐ गऐ अतिक्रमणों को हटाने की पेशकश की। नगरवासियों ने भी टिन के झोपड़ों को हटाने से पूर्व स्वयं से शुरू करने की ऐसी ही पेशकश की। उन्होंने नालों में कूड़ा डालने से भी तौबा करते हुऐ माना कि नालों से ही झील में गन्दगी जाती है, और झील ही नगर की जीवनरेखा है। पर्यटन व्यवसायियों ने सैलानियों को बेवकूफ न बनाने का वादा किया। इसके पश्चात सभी वर्ग के लोगों, भावी स्वर्गवासियों ने परियोजना को हर्ष ध्वनि से मंजूरी दे दी। 
(बुरा न मानें होली है। आलेख  को मजाक में न उड़ाऐं।)

Friday, February 26, 2010

घोडाखाल: यहां अर्जियां पढ़कर ग्वल देवता करते हैं न्याय

ग्वल देव के दरबार में न्यायालयों से थके हारे लोग लगाते हैं न्याय की गुहार
ग्वेल, ग्वल, गोलज्यू कुछ भी कह लीजिऐ, यह कुमाऊं के सर्वमान्य न्याय देवता के नाम हैं, जो आज भी न्यायालयों में पूरी उम्र न्याय की आश में ऐड़िया रगड़ने को मजबूर लोगों को चुटकियों में न्याय दिलाने के लिए प्रसिद्ध हैं। इस हेतु उनके दरबार में न्याय की आस में लोग बकायदा सादे कागजों के साथ ही स्टांप पेपरों पर भी अर्जियां लगाते हैं। यह भी मान्यता है कि यहां अर्जियां लगाने से श्रद्धालुओं को नौकरी, विवाह, संपत्ति आदि की रुकावटें भी दूर होती हैं।
ग्वल देव कुमाऊं के राजकुमार थे। उनका राजमहल आज भी चंपावत में बताया जाता है। अपने जन्म से ही सौतेली माताओं के षडयन्त्र के कारण कई विषम परिस्थितियों में घिरे राजकुमार अपने न्याय कौशल से ही राजभवन लौट पाऐ थे। इसी कारण उन्हें न्याय देव के रूप में कुमाऊं के जन जन द्वारा ईष्ट देव के रूप में अटूट आस्था के साथ पूजा जाता है। चंपावत, द्वाराहाट, चितई व नैनीताल के निकट घोड़ाखाल नामक स्थान पर उनके मन्दिर स्थित हैं, जहां प्रवासी कुमाउंनियों के साथ ही अन्य प्रदेशों के लोग भी लगातार आते रहते हैं, और खास पर्वों पर मन्दिरों में भक्तों का मेला लगता है। उनके मन्दिरों को कमोबेश देश, राज्य में चल रही राजस्व व्यवस्था की तरह ही न्यायिक अधिकार बताऐ जाते हैं। श्रद्धालुओं को इसका लाभ भी मिलता है। घोड़ाखाल एवं चितई आदि मन्दिरों में बंधी असंख्य घंटियां बताती हैं कि कितने लोगों को यहां से न्याय मिला और मनमांगी मुराद पूरी हुई।
युगलों के विवाह का पंजीकरण भी होता है यहां 

जिस प्रकार युगल वैवाहिक बंधन में बंधने के लिए परगना मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विवाह पंजीकृत कराते हैं, उसी तर्ज पर ग्वल देव के मन्दिरों में भी विवाह का पंजीकरण किया जाता है। इस हेतु बकायदा स्टांप पेपर पर वर एवं वधु पक्ष के गिने चुने और कभी कभार प्रेमी युगल भी मन्दिर पहुंचते हैं, और स्टांप पेपर पर विवाह बंधन में बंधने का शपथ पत्र देते हैं। जिसके बाद ही यहां सादे विवाह आयोजन की इजाजत होती है।
लेकिन घंटों का गला पकड़ लिया गया...





मन्दिरों के घंटे घड़ियालों की मधुर ध्वनि किसे अच्छी नहीं लगती। इसे पर्यावरण के शुद्धीकरण में भी उपयोगी माना जाता है। लेकिन लगता है कि घोड़ाखाल मन्दिर प्रबंधन इसका अपवाद है। मनमांगी मुरादें पूरी होने पर श्रद्धालु ग्वल देव के मन्दिरों में घंटियां चढ़ाते हैं। छोटी घंटियों की असंख्य संख्या को देखते हुऐ पूर्व में घोड़ाखाल मन्दिर प्रबंधन ने छोटी घंटियों को गलाकर बड़ी घंटियों में बदल दिया था। मन्दिर में सवा टन भारी घंटियां तक मौजूद हैं। लेकिन इधर मन्दिर प्रबंधन लगता है घंटियों की मधुर ध्वनि से परेशान है। शायद इसी लिए घंटियों को इस तरह बांध दिया गया है कि श्रद्धालु चाहकर भी इसे नहीं बजा पाते। मन्दिर के पुजारी भी नि:संकोच स्वीकार करते हैं कि घंटियों की अधिक ध्वनि के कारण उन्हें बांध दिया गया है।

Friday, February 19, 2010

निर्मल का जाना

नैनीताल के मॉल रोड स्थित नगर पालिका द्वारा  नर्सरी स्कूल से हिन्दी में ककहरा सीखने वाला बच्चा 47 वर्ष की अल्पायु में ही न केवल दर्जन भर हिन्दी फिल्में और दर्जनों नाटक कर आया, वरन कालेज से निकलकर लन्दन में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता हुआ नाटक करने लगा, हॉलीवुड की फिल्मों में भी दिखाई दिया, और सात समुन्दर पार फ्रांस के केन्स फिल्मोत्सव में सर्वश्रेश्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार प्राप्त करने वाला देश का एकमात्रा पुरुष कलाकार का खिताब जीत आया। 47 वर्षों में इस लंबी कहानी को उनके नगर, प्रान्त और देश वासी और अधिक लंबा देखना सुनना चाहते थे, लेकिन दुनियां के निर्मल और नैनीताल के नानू इस कहानी को आधा अधूरा छोड़ कर हमेशा के लिए विदा हो गऐ।

  • बड़े शौक से सुन रहा था ज़माना तुम्हें, तुम ही सो गए दास्तां कहते-कहते....
  • नर्सरी स्कूल से हॉलीवुड तक का कठिन सफर तय किया था निर्मल ने
निर्मल की 47 वर्षों की छोटी जीवन यात्रा में से उनके स्टार बनने के बाद की कहानी तो शायद सबको पता हो लेकिन इससे पीछे की कहानी थोटे शहरों में बड़े सपने देखने वाले किसी भी युवक के लिऐ प्रेरणास्पद हो सकती है। अभिनय की प्रतिभा खैर उन्हें विरासत में मिली। उनके नाना जय दत्त पाण्डे मशहूर कथावाचक थे, जबकि योजना विभाग में बड़े बाबू पिता हरीश चन्द्र पाण्डे एवं माता रेवा पाण्डे की भी संगीत में गहरी रुचि थी। गौशाला स्कूल से निकलकर नगर के सीआरएसटी इंटर कालेज में पहुंचते निर्मल के भीतर का कलाकार बाहर आ गया। विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य मोहन लाल साह बताते हैं सीआरएसटी से ही निर्मल ने 1978 में तारा दत्त सती के निर्देशन में स्कूल के रामलीला वैले से बड़े भाई मिथिलेश के साथ राम लक्ष्मण की भूमिका अदा कर अभिनय की शुरूआत की थी। इसे देख स्कूल के सांस्कृतिक क्लब के अध्यक्ष मरहूम जाकिर हुसैन साहब निर्मल से इतने प्रभावित हुऐ कि इस नन्हे बालक को क्लब का सचिव बना दिया। 80 में निर्मल युगमंच संस्था से जुड़े और डीएसबी से एमकॉम करने लगे। इस दौरान ही उन्होंने सीआरएसटी में राजा का बाजा नाटक किया। इससे पूर्व उन्होंने नगर के ही इदरीश मलिक के निर्देशन में हैमलेट नाटक से अभिनय को नऐ आयाम दिऐ। 
युगमंच के लिए अनारो उनका पहला नाटक था। पहले प्रयास में ही निकलकर 86 में वह एनएसडी चले गऐ, और एनएसडी के लिए अजुवा बफौल सहित कई नाटक किऐ। 89 में एनएसडी ग्रेजुऐट होते ही वह लन्दन की तारा आर्ट्स संस्था से जुडे़ और संस्था के लिए सैक्सपियर के कई अंग्रेजी नाटक किऐ। इसी दौरान उन्होंने विश्व भ्रमण भी किया। इसी दौरान के प्रदर्शन पर शेखर कपूर ने उन्हें `बैण्डिट क्वीन´ फिल्म में ब्रेक दिया। जिसके बाद ही वह रुपहले पर्दे पर अवतरित हुऐ। दायरा फिल्म में महिला के रोल के लिए उन्हें केन्स फिल्म समारोह में फ्रांस का सर्वश्रेश्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। उनसे प्रेरणा पाकर नगर के सुवर्ण रावत, योगेश पन्त, ज्ञान प्रकाश, सुमन वैद्य, सुनीता चन्द, ममता भट्ट, गोपाल तिवारी, हेमा बिश्ट आदि कई कलाकारों ने एनएसडी का रुख किया, इनमें से कई बॉलीवुड में स्थापित भी हुऐ हैं। शायद इसी लिए उनके साथी रहे वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम एवं उनके पूर्व शिक्षक एवं प्रधानाचार्य मोहन लाल साह कहते हैं, ऐसा लगता है मानो पहाड़ टूट गया हो। पहाड़ उन्हें बड़ी उम्मीदों से बहुत आगे जाता देख रहा था, अफसोस वह ही सो गऐ दास्तां कहते कहते....।

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