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Thursday, January 21, 2010

नीरो सरकार जाये, जनता जनार्दन आती है

आज देश के समक्ष बढ़ी किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति है. देश में महंगाई कहने भर को नहीं, वाकई सातवें आसमान पर है, और सरकार के मंत्री अपने सुख-संसाधनों के साथ अपने व्यापारी आकाओं के हित साधने की चिंताओं में न केवल उलझे हुए हैं, वरन "नीरो" की तरह "बंशी" बजा रहे हैं. खासकर "आम आदमी की सरकार" के कृषि मंत्री शरद पवार अपने सत्तासीन होने से ही आम आदमी की थाली खाली करने और पहले चीनी को अपने एक बयान से कढवा करने के बाद अब दूध को महंगाई की हांडी में उबालने पर तुले हुए हैं. देश के अकेले "इंसान" शशि थरूर आजादी के 62 साल बाद भी "आम आदमी" ही बने रहने को मजबूर अधिसंख्य देशवासियों को "जानवर" कह चुके हैं, और अफ़सोस कि "जानवर" घुड़क भी नहीं रहे.
एक समय था जब महंगा होने पर केवल प्याज ने सरकार गिरा दी थी, और आज कहने को देश के शीर्ष पदों पर एक-दो नहीं कई "देश के सर्वश्रेष्ठ अर्थशाश्त्री " आसीन हैं. स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन जी (मनमोहन ने तो त्रेता में भी बांसुरी बजाई थी, पर प्रेम की), पी चिदंबरम जी, मोंटेक सिंह अहलूवालिया जी, प्रणव जी तथा और भी कई लोग. लेकिन फिर भी महंगाई केवल कहने भर को नहीं, वास्तव में सुरसा के मुंह की तरह दिन दोगुनी-रात चौगुनी गति से बढ़ रही है. और सबसे बढ़ी चिंता की बात यह कि इन सभी को यह कहने में लेश मात्र की शर्म नहीं आ रही कि महंगाई को रोकने में वे असमर्थ हैं. 
तो क्या देश के सामने संकट केवल महंगाई का ही नहीं वरन "देश के अर्थशाश्त्रियों के सामर्थ्य शून्य होने" का भी है ? हांलांकि मानना पड़ेगा की यह सच्चाई नहीं है, नेताओं की देश के बजाये निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देने की राजनीतिक से अधिक व्यावसायिक मजबूरी इस समस्या की जड़ में है. शरद पवार व शशि थरूर जैसे उनके मंत्रिमंडल के अन्य व्यापारी मित्र भी इसी व्यवस्था के अंग लगते हैं.





याद रखना होगा कि केंद्र में अपने समय में "रोटी" के लिए चीखने वाले देशवासियों को "ब्रेड" खाने की सलाह देने वालीं और स्वयंभू "इंदिरा इज इंडिया" की "गरीबी हटाओ" के नारे के साथ 62 में से 50 साल से अधिक राज करने वाली ही सरकार है. यह अलग बात है कि उनका जोर गरीबी की बजाये गरीबों को हटाने पर ही अधिक रहा. हाँ, इधर उनके पौत्र राहुल जरूर आशा जगाते हैं कि उन्हें गरीबों की कुछ फ़िक्र है.

ऐसे में समय आ गया है, जब सरकार को जाना चाहिए, केवल पवार की बलि तक से लोकतंत्र के सबसे बड़े देव जनता जनार्दन को संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए. अन्यथा सरकार को अब तो बातों के इतर कुछ करके दिखाना चाहिए, सत्ता छोड़ कर जाने या दूसरों को सत्ता सौंपने का साहस न हो तो इतना तो कर के देख लें कि राहुल को कमान सौंप दें.

Sunday, January 10, 2010

क्या रिपोर्टर को फांसी पर लटका देना चाहिए ?

गत दिवस एक न्यूज़ चैनल पर आयी खबर पर रिपोर्टर व चैनेल के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठी है. मैं पूछता हूँ, क्या रिपोर्टर को फांसी पर लटका देना चाहिए ?

घटना के अनुसार एक पुलिस सब इंस्पेक्टर की समय पर चिकित्सा सहायता न होने से मौत हो गयी. कल रास्ते में कुछ अपराधियों ने इस पुलिस कर्मचारी की टांग काट दी थी. वह घायल अवस्था में सड़क पर ही पड़ा रहा. कुछ ही देर में दो मंत्रियों का काफिला वहां से गुजरा, साथ में कलक्टर साहब भी थे. पर किसी ने उसे अस्पताल पहुचाने की जहमत नहीं उठाई. कलक्टर साहब ने काफी देर बाद अबुलेंस को फ़ोन किया पर जब बीस मिनट तक अबुलेंस नहीं आई तो लोग पुलिस कर्मचारी को उठा कर अपनी ही गाड़ी में ले गए पर तब तक देर हो चुकी थी और अधिक खून बह जाने के कारण उसकी मौत हो गयी. मेरा कहना है, जो काम जिसका है वही ठीक से करले तो कोइ दिक्कत नहीं है, हमेशा नेगटिव तरीके से चीजों को देखना भी ठीक नहीं. एक न्यूज़ रिपोर्टर की जिम्मेदारी क्या है ? यही नां कि समाज मैं जो हो रहा है वह सबके सामने रखे, या कि बन्दूक लेकर देश की रक्षा के लिए सीमा पर चला जाए. या खुद ही नेता बन जाए. 
मेरे हिसाब से कलम समाज को आईना दिखाने के लिए होती है, साहित्य को समाज का आईना ही कहा गया है. वह इस घटना को शूट न करता तो दोषियों को सजा की बात ही कहाँ से उठती, इससे इतना तो हुआ कि बहुत से लोग इस घटना पर सोचने को मजबूर हुए. अगर भविष्य मैं ऐसा कोई वाकया उनके सामने खुदानखास्ता हुआ तो शायद उनमें से कुछ लोग ही घायल को बचाने को उद्यत होंगे, क्या यह उस रिपोर्टर और न्यूज़ चैनल की सफलता नहीं. और क्या इस सफलता के लिए आप उसे फांसी की सजा देना चाहेंगे. वैसे भी शायद यह खबर दिखाने वाले टीवी ने साफ़ किया है कि यह खबर उनके रिपोर्टर ने शूट नहीं की, और जिसने की उसने कहा है कि उसके पास इतने संसाधन नहीं थे.

Tuesday, January 5, 2010

तिवारी जी के बहाने : नैतिकता और अनैतिकता


आखिर अपने तिवारी जी ना नुकुर कर आंध्र के राजभवन से 'घर' लौट आये हैं. कोशिश की कि घर में छुप कर बैठने के बजाये खुलकर रहेंयह दिखाने के लिए कि वह 'नग्नतामें भी साफ़ हैं, लेकिन वह इस कोशिश में लाख प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो पाए. 'चौरसियाजी' ने उन्हें नग्न कर ही दिया. उन्हें ताव में ही सही स्वयं पर लगे आरोपों को स्वीकार करना पड़ा....

तिवारी कौन हैं, शायद यह बताने की जरूरत नहीं. उन्होंने राजनीति की शुरुवात समाजवादियों की लाल टोपी पहनकर प्रजा सोशलिष्ट पार्टी से की थी, इसी पार्टी से वह 1952 व 1957 में उत्तर प्रदेश विधान सभा में पहली बार गए थे, लेकिन जब 1962 में हारे तो इसे झटक कांग्रेस का दामन थाम लिया. जहाँ से वह उत्तर प्रदेश के चार बार मुख्यमंत्री और केंद्र में प्रधानमंत्री छोड़कर न जाने किस-किस विभाग के मंत्री बने. हाँ, 1991 की राम लहर में वह भाजपा के नए प्रत्याशी बलराज पासी से हार गए और पहाड़ के मुलायम सिंह यादव के विरोध के दौर में मुलायम समर्थक एक दिन के मुख्यमंत्री जगदम्बिका पाल के समर्थन में दिए उनके एक बयान ने उन्हें चुनाव हरा न दिया होता तो वह देश के प्रधानमंत्री भी शायद बन गए होते. इतने बड़े कद के बावजूद कभी तिवारी ने इतना कुछ देने वाली कांग्रेस पार्टी से एक झटके में दामन झटक कर 'तिवारी कांग्रेस' बनाने से भी गुरेज न किया तो कभी "उत्तराखंड मेरी लाश पर बनेगा" कहने वाले तिवारी जी उत्तराखंड विधानसभा का सदस्य न होते हुए भी प्रदेश की पहली निर्वाचित विधानसभा के पहले मुख्यमंत्री बनने का लोभ संवरण न कर पाए, और अपनी अनिच्छा से बने उत्तराखंड को काट-पीट कर अपने उन चाटुकारों के साथ मिल-बाँट कर खाते रहे, जिन्होंने उनसे अब पूरी दूरी बना ली है. लगता है कि तिवारी जी के उसी दौर के कर्म अब उन्हें 'पिड़ा' रहे हैं. और एक वरिष्ठ पार्टी नेता के अनुसार पार्टी हाईकमान ने 'तिवारी नाम के सांप का फन' अपने पैरों तले तब तक के लिए दबा कर रख दिया है, जब तक वह कुचल कर दम न तोड़ दें. वैसे 'राजनीति में रिश्ते बनाए तो जाते हैं, पर अधिक लम्बे निभाये नहीं जाते. हाँ, वक्त पड़ने पर उनकी सियासी फसल जरूर काट ली जाती है' यह कहावत कभी तिवारी पर सटीक बैठती थी, और अब वह स्वयं इसके भुक्तभोगी हैं....
बहरहाल, तिवारीजी के आंध्र के राजभवन में सेक्स स्कैंडल में फंसने के दिनों से ही लोगों में तरह तरह की चर्चाएँ हैं. चर्चाएँ इस बात को लेकर नहीं कि 86 की उम्र में तिवारी ने ये क्या कर दिया ? क्यों किया? गंगा नहाने की उम्र में अपनी ही 'गंगा मैली' कर दीसफ़ेद खादी के लबादों वाली राजनीति में ऐसा दाग क्यों लगाया. वरन, किसी को संदेह नहीं है कि तिवारीजी ने ऐसा नहीं किया होगा आंध्र के राजजभवन में,   ही रोहित शेखर की मां उज्जवला शर्मा के साथ

तिवारीजी को जरा भी नजदीक से जानने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि वह ऐसे ही हैंउत्तराखंड में उनके ऐसे लाख चर्चे पहले से रहे हैंउत्तर प्रदेश के लखनऊरायबरेलीइलाहाबाद में भी उनकी ऐसी ही खूब पहचान हैउत्तराखंड में मुख्यमंत्री रहते ही उन्हें यहाँ के प्रसिद्ध कविगायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने 'नौछमी नारेणाकह कर बाकायदा सीडी जारी कर दी थीजिसे तब उन्होंने बैन करवा दिया था लेकिन इन दिनों यह सीडी फिर से हिट हो रही हैइसमें तिवारी जी द्वारा लाल बत्ती से नवाजी गयी 'गोर्ख्यालीतथा अन्य महिला मित्रों की ओर भी इशारा किया गया था .इस मामले में भी जिस राधिका का नाम आ रहा है, वह उनकी पुरानी महिला मित्र ही बतायी जाती है, हालांकि वह अब उन्हें नंगा करने के लिए खुद यह खेल खेलने का दावा कर रही है. 

देश और खासकर उत्तराखंड में जहाँ उनके लाखों समर्थक हैं, जो उन्हें 'बूबू' (दादाजी) की तरह मानते और पूजते भी हैं, एक-आध बार के अलावा हमेशा उन्हें वोटों के रूप में अपना प्यार भी दिया. वहां भी कमोबेश सभी इस बात पर एकमत हैं. 

बहरहाल, कथित तौर पर तिवारी जी को उनके जवानी के दिनों में उनकी जरूरत के ताजे 'पकवान' परोसने वाले कुछ चाटुकार उनके समर्थन की मुहिम चलाये हुए हैं. बाकी लोग चटखारे ले रहे हैं.....तिवारीजी ने साबित कर दिया उत्तराखंड 'हर्बल स्टेट' है, जिस 86 की उम्र में लोग अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाते उस उम्र में तिवारी जी 'ख़राब स्वास्थ्य' के बावजूद तने हुए हैं... राजनीति का गंदा धंदा छूट भी गया तो 'यारसा गम्बू' के ब्रांड अम्बेसडर बनने का विकल्प तो खोल ही दिया है.....,लोग पूछ रहे हैं- तिवारीजी सही है कि आपने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, पर वह बीमारी तो बता दीजिये.. वगैरह... वगैरह.... 

लेकिन कुछ लोग उनके समर्थन में भी हैं, वह रामायण, महाभारत काल से लेकर चर्चिल, गाँधी, नेहरु.. जिन्ना....क्लिंटन जैसे उदाहरण देकर उन्हें सही साबित करने की कोशिश में हैं. 'शिबौ, त्याड़ज्यू को फंसाया गया है' कहकर झूठी सहानुभूति हासिल करने की असफल कोशिश भी की जा रही है. बहरहाल सभी सहमत हैं की उन्होंने ऐसा किया है. 

याद रखना होगा कि अनैतिकता हर युग में रही है पर हमेशा परदे के पीछे और विरोध के साथ......

इस भुलावे में भी न रहें की पश्चिम में सब चलता है की तर्ज पर इसे यहाँ भी स्वीकार कर लिया जायेगा. अपने यहाँ रुचिका का मामला चर्चा में है ही, I.A.S. अफसर रूपल देओल फिर से गिल से पद्मश्री वापस लिए जाने की मांग कर रही हैं. यहाँ देवभूमि से तो पूरे देश को 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता' का सन्देश गया था, और उधर पश्चिम में भी अनैतिक कर्म अनैतिक ही हैं. नैतिक होता तो क्लिंटन की हवस का शिकार होने के बाद से मोनिका सबूत की उस 'चादर' को इतने वर्ष न ढो रही होती. इसे साधारण बात मान कर भूल जाती. यदि होता तो आज ब्रिटेन का प्रसिद्ध समाचार पत्र 'द सन' तिवारी जी को लेकर अंग्रेजी में 'ऑर्गी मिनिस्टर 86' यानी 'भोगी मंत्री 86' हेडिंग लगाकर समाचार न छापता. 


अनैतिक तो केवल पशुओं में ही नैतिक हो सकता है. हाँ इंसानों में भी होता था, लेकिन तभी तक, जब तक उसने ज्ञान का फल नहीं खाया था. अनैतिकता केवल निर्बुद्धि लोगों के लिए ही नैतिक हो सकती है. और सार्वजनिक जीवन के लोगों में इतनी नैतिकता की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि वह समाज के लिए आदर्श प्रस्तुत करैं. आखिर वह हमारे नेता हैं...लीडर हैं. और राजनेताओं में तो खास तौर पर, क्योंकि वह जनता के मत से ही इस मुकाम पर पहुंचे हैं.  

हाँ, आखिर में एक बात और, तिवारी जी के मामले में अन्य राजनेताओं की चुप्पी समझ से परे है. खास कर आदर्शों की बात करने वाली और मुख्य विरोधी दल भाजपा के नेताओं की, कहीं यह चुप्पी दूसरों पर कीचड़ उछालने से अपने दामन पर भी छीटे आने के डर के कारण है या उन्हें 'हम्माम में सभी नंगे' कहावत के सही साबित हो जाने का डर सता रहा है ?

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